दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से पूछा- 15 रुपये की दवा की MRP 250 रुपये क्यों?

दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कड़े सवाल किए हैं। अदालत ने पूछा कि जब किसी दवा का खुदरा विक्रेता मूल्य (PTR) महज 15 रुपये है, तो उसकी अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) 250 रुपये कैसे तय की जा सकती है? न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने दवाओं की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण की जरूरत बताते हुए कहा कि कीमतों में इतना बड़ा अंतर गंभीर चिंता का विषय है।

दवाओं की कीमतों में अंतर पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं के PTR और MRP के बीच भारी अंतर पर सवाल उठाए। पीठ ने पूछा कि कई दवाओं की कीमतों में 300 से 400 प्रतिशत या उससे भी अधिक का अंतर क्यों है और इससे होने वाले लाभ का हिसाब क्या है। अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि क्या ऐसी स्थिति को उचित ठहराया जा सकता है, जबकि कीमतों में अंतर आम लोगों पर आर्थिक बोझ डालता है।
NPPA की भूमिका पर भी सवाल
दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए गठित राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की भूमिका पर भी अदालत ने सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि जब दवाओं की कीमतों में इतना बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है, तो इस पर प्रभावी नियंत्रण क्यों नहीं हो पा रहा है। NPPA का उद्देश्य लोगों को उचित और किफायती कीमतों पर दवाएं उपलब्ध कराने में मदद करना है।
कैंसर की दवाओं के मार्जिन पर चर्चा
सुनवाई में केंद्र सरकार ने बताया कि कैंसर-रोधी दवाओं के व्यापार मार्जिन को MRP के 30 प्रतिशत तक सीमित करने का निर्णय लिया गया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि अन्य दवाओं के लिए भी 16 प्रतिशत का एक समान व्यापार मार्जिन निर्धारित करने पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता। पीठ ने यह भी पूछा कि कैंसर की दवाओं के मार्जिन पर सीमा तय करने में इतना समय क्यों लगा।
11 हजार रुपये का इंजेक्शन अस्पताल में 1.30 लाख रुपये का
अदालत ने एक मामले का उल्लेख करते हुए चिकित्सा क्षेत्र में कीमतों के अंतर पर चिंता जताई। पीठ के मुताबिक, कैंसर के इलाज के दौरान एक अस्पताल ने इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये वसूले, जबकि वही इंजेक्शन एक मेडिकल वितरक को 11 हजार रुपये में उपलब्ध था। अदालत ने इस उदाहरण के जरिए दवाओं और चिकित्सा सेवाओं की कीमतों में अंतर को लेकर सवाल उठाए।
मरीजों की मजबूरी पर अदालत की टिप्पणी
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के साथ फार्मास्युटिकल उद्योग के विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की बात कही। इस पर पीठ ने कहा कि मरीज दवाओं की कीमतों को लेकर मोलभाव नहीं कर सकते और इलाज की जरूरत के कारण उन्हें खर्च उठाना पड़ता है। अदालत ने मरीजों के हितों को ध्यान में रखते हुए कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण की आवश्यकता पर जोर दिया।
दवाओं की कीमतों पर फैसले सुरक्षित
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह चाहता है कि हर दवा को जेनेरिक दवा के रूप में उपलब्ध कराने की दिशा में विचार किया जाए। पीठ ने केंद्र सरकार से दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और नियंत्रण से जुड़े सवालों पर जवाब मांगे। दवाओं की कीमतों पर सख्त नियंत्रण सहित अन्य संबंधित मुद्दों को उठाने वाली दो याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।




