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8वें वेतन आयोग में मिनिमम और मैक्सिमम कितनी होगी सैलरी; DA, पेंशन समेत पर अपडेट

केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बीच इन दिनों 8वें वेतन आयोग को लेकर चर्चा तेज है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर नया वेतन आयोग लागू होता है तो न्यूनतम बेसिक सैलरी कितनी बढ़ सकती है। फिलहाल यह सिर्फ अनुमान और गणना के आधार पर समझने की कोशिश है, क्योंकि अंतिम फैसला पूरी तरह 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों और सरकार के निर्णय पर ही निर्भर करेगा।

क्या है पिछला पैटर्न

अगर पिछले अनुभव को देखा जाए तो 7th पे कमीशन के लागू होने के बाद न्यूनतम बेसिक सैलरी ₹7,000 से बढ़ाकर ₹18,000 कर दी गई थी। उस समय 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया था, जिससे कागज पर सैलरी में करीब 157% की बढ़ोतरी दिखाई दी। हालांकि असल में कर्मचारियों की वास्तविक सैलरी बढ़ोतरी करीब 14% के आसपास ही थी, क्योंकि बाकी बढ़ोतरी महंगाई भत्ते (DA) को बेसिक सैलरी में जोड़ने की वजह से हुई थी।

दरअसल, वेतन आयोग पहले महंगाई भत्ते को बेसिक सैलरी में मर्ज करता है ताकि उस समय की महंगाई के हिसाब से नई सैलरी तय की जा सके। 2016 में जब 7वां वेतन आयोग लागू हुआ, तब महंगाई भत्ता 125% तक पहुंच चुका था। ऐसे में बेसिक सैलरी (1.00) और DA (1.25) को जोड़कर 2.25 का आधार तैयार किया गया और फिर उस पर वास्तविक सैलरी बढ़ोतरी जोड़कर 2.57 का फिटमेंट फैक्टर तय किया गया।

60% तक पहुंच सकता है महंगाई भत्ता

अब अगर यही तरीका 8th पे कमीशन में भी अपनाया जाता है तो गणना कुछ अलग हो सकती है। अनुमान है कि 1 जनवरी 2026 तक महंगाई भत्ता करीब 60% तक पहुंच सकता है। अगर इसे बेसिक सैलरी में जोड़ा जाए तो महंगाई के हिसाब से आधार 1.60 बनता है। इसके बाद अगर 7वें वेतन आयोग की तरह करीब 14.22% की वास्तविक सैलरी बढ़ोतरी दी जाती है, तो संभावित फिटमेंट फैक्टर करीब 1.83 बन सकता है।

क्या है सैलरी का कैलकुलेशन

अगर इस अनुमानित 1.83 फिटमेंट फैक्टर को मौजूदा न्यूनतम बेसिक सैलरी ₹18,000 पर लागू किया जाए तो नई न्यूनतम सैलरी करीब ₹32,940 तक पहुंच सकती है। यानी 8वें वेतन आयोग के लागू होने पर न्यूनतम बेसिक सैलरी लगभग ₹33,000 के आसपास हो सकती है। हालांकि अगर आयोग इससे ज्यादा फिटमेंट फैक्टर तय करता है तो सैलरी इससे भी ज्यादा बढ़ सकती है।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ एक गणितीय उदाहरण है, कोई आधिकारिक अनुमान नहीं। अंतिम सैलरी संरचना तय करते समय महंगाई, देश की आर्थिक स्थिति, सरकारी खर्च और कई अन्य पहलुओं को ध्यान में रखा जाएगा। इसलिए सरकारी कर्मचारियों को फिलहाल इसे केवल एक संभावित गणना के तौर पर ही देखना चाहिए, असली तस्वीर आयोग की अंतिम सिफारिशों के बाद ही साफ होगी।

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