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बस्तर दशहरा: आस्था, एकता और लोकतांत्रिक परंपराओं की अनूठी पहचान, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने की सराहना

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बोले—माओवाद से मुक्त बस्तर अब नवनिर्माण और विकास की राह पर

मांझियों का मानदेय बढ़कर 5,000 रुपये और चालकी का 3,500 रुपये प्रतिमाह हुआ

जगदलपुर । बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराओं और सामूहिक आस्था के प्रतीक विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु शामिल हुईं। जगदलपुर में आयोजित इस ऐतिहासिक आयोजन में राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा को सामाजिक समरसता, सामूहिक सहभागिता और लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत उदाहरण बताया। वहीं, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि माओवाद से मुक्त हो रहा बस्तर अब नवनिर्माण, विकास और खुशहाली के नए दौर की ओर बढ़ रहा है।

राष्ट्रपति ने माँ दंतेश्वरी की पावन भूमि को नमन करते हुए कहा कि लगभग 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट परंपराओं और जनभागीदारी के कारण विशेष पहचान रखता है। इस उत्सव में विभिन्न समुदायों और गोत्रों के लोग अपनी पारंपरिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। रथ निर्माण, पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों में सबकी भागीदारी सामाजिक एकता, सहयोग और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का प्रेरक उदाहरण है।

मुरिया दरबार में दिखाई देती है लोकतंत्र की जड़ें

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा के अंतर्गत आयोजित होने वाले मुरिया दरबार को जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक संवाद की उत्कृष्ट परंपरा बताया। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर जनसमस्याओं और सामाजिक आवश्यकताओं पर विचार-विमर्श करते हैं। सामूहिक चर्चा के माध्यम से समाधान तलाशने की यह परंपरा भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना को मजबूत करती है।

उन्होंने बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे मंच जनजातीय युवाओं को अपनी कला, संस्कृति, रीति-रिवाजों और परंपराओं से जोड़ते हैं। जनजातीय समाज में अपार प्रतिभा और संभावनाएं हैं। उचित अवसर और संसाधन मिलने पर यहां के युवा खेल, शिक्षा, उद्यमिता और अन्य क्षेत्रों में राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं।

जनजातीय संस्कृति और प्रकृति संरक्षण का संदेश

राष्ट्रपति ने बस्तर की ऐतिहासिक एवं धार्मिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृतियां दंडकारण्य और रामायण के प्रसंगों से जुड़ी हैं। भगवान श्रीराम, माता सीता और माता शबरी से संबंधित प्रसंग समाज को मर्यादा, भक्ति, नैतिकता और मानवीय मूल्यों की प्रेरणा देते हैं।

उन्होंने जनजातीय समाज की प्रकृति के प्रति आस्था को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि जंगल, पहाड़, पेड़-पौधे और प्राकृतिक संसाधन जीवन का आधार हैं। इनका संरक्षण करना वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने अधिकाधिक पौधरोपण करने और वनों को सुरक्षित रखने का आह्वान किया।

राष्ट्रपति ने छत्तीसगढ़ में सुरक्षा और विकास के क्षेत्र में हो रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए विश्वास जताया कि बस्तर के लोग अपनी प्रतिभा और परिश्रम से देश की विकास यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

बस्तर के विकास के लिए सरकार प्रतिबद्ध: मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए कहा कि बस्तर की धरती से उनका विशेष जुड़ाव रहा है। इसी वर्ष फरवरी में राष्ट्रपति ने बस्तर पंडुम का शुभारंभ किया था और इसके विजेताओं को राष्ट्रपति भवन आमंत्रित कर उनका उत्साहवर्धन किया था। बस्तर दशहरा में उनकी उपस्थिति से क्षेत्र के लोगों में उत्साह और गौरव की भावना बढ़ी है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि लगभग 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा जनजातीय समाज की सामूहिकता, समता और आपसी विश्वास का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि बस्तर हिंसक माओवाद से बाहर निकलकर विकास और पुनर्निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन इस परिवर्तन को गति देने के साथ स्थानीय प्रतिभाओं को पहचान दिला रहे हैं।

उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने बस्तर के समग्र विकास के लिए विभिन्न योजनाओं पर काम तेज किया है। नियद नेल्लानार योजना के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों तक शासकीय योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा रहा है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और पीएम-जनमन के तहत अंदरूनी बसाहटों को सड़क संपर्क से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना से परिवहन सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने रेल संपर्क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में हो रहे कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जगदलपुर में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल शुरू किया गया है और गीदम में मेडिकल कॉलेज इसी शैक्षणिक सत्र से प्रारंभ हुआ है। ओरछा और जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी विकसित करने की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है। वन धन केंद्रों के जरिए वनोपज संग्राहकों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने विश्वास जताया कि इन पहलों से बस्तर में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार होगा और स्थानीय लोगों के लिए विकास एवं रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे।

मांझियों और चालकी का बढ़ा मासिक मानदेय

बस्तर की पारंपरिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मांझियों और चालकी के मानदेय में वृद्धि की गई है। संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने बताया कि मांझियों का मासिक मानदेय 2,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये तथा चालकी का मानदेय 1,500 रुपये से बढ़ाकर 3,500 रुपये किया गया है।

उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा की परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने में पारंपरिक प्रतिनिधियों, पुजारियों, कारीगरों, रथ निर्माताओं और स्थानीय समुदायों का अहम योगदान है। मानदेय में वृद्धि उनके योगदान के सम्मान और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

राज्यपाल ने बताया सामाजिक सहभागिता का उत्सव

राज्यपाल रमेन डेका ने बस्तर दशहरा और विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्य उसकी सभ्यता और सामाजिक परंपराओं में गहराई से समाहित हैं। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा में रथ निर्माण से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों तक अनेक गांवों और समुदायों की भागीदारी सामूहिकता की भावना को प्रदर्शित करती है।

राज्यपाल ने मुरिया दरबार को संवाद और समाधान की परंपरा बताते हुए कहा कि शासन और समाज के बीच सार्थक चर्चा से समस्याओं के समाधान का रास्ता निकलता है। उन्होंने इस आयोजन को जीवंत बनाए रखने वाले सभी पारंपरिक प्रतिनिधियों और समुदायों के योगदान की सराहना की।

सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ विकास पर जोर

बस्तर दशहरा के दौरान कुटुम्ब जात्रा और माँ दंतेश्वरी एवं देवी मावली की डोली विदाई जैसे पारंपरिक अनुष्ठान इस उत्सव की विशिष्ट पहचान हैं। राष्ट्रपति ने इन परंपराओं को बस्तर की सांस्कृतिक निरंतरता का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए क्षेत्र की सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

कार्यक्रम में उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, वन मंत्री केदार कश्यप, कृषि मंत्री राम विचार नेताम, शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े, बस्तर सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, कांकेर सांसद भोजराज नाग, जगदलपुर विधायक किरण सिंह देव, कोंडागांव विधायक लता उसेंडी सहित अनेक जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।

इसके अलावा प्रशासनिक अधिकारियों, पारंपरिक मांझी-चालकी, जनजातीय प्रतिनिधियों, बस्तर दशहरा समिति के सदस्यों और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिकों ने भी उत्सव में सहभागिता की।

बस्तर दशहरा ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, सामाजिक एकता, जनभागीदारी और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। बस्तर की परंपराओं को सहेजते हुए क्षेत्र को विकास की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संकल्प इस आयोजन का प्रमुख संदेश बनकर उभरा।

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