दुनिया तेजी से हो रही बूढ़ी, कम होते युवाओं के बीच बढ़ेगी अर्थव्यवस्था की चुनौती

बिजनेस डेस्क: दुनिया के कई देशों में जनसंख्या का संतुलन तेजी से बदल रहा है। जन्म दर में कमी और लोगों की बढ़ती जीवन प्रत्याशा के कारण बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है, जबकि कामकाजी उम्र की आबादी का हिस्सा घट रहा है। इसका असर आने वाले वर्षों में पेंशन, हेल्थकेयर, टैक्स कलेक्शन और आर्थिक विकास पर पड़ सकता है।
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज के विश्लेषण के मुताबिक, यूरोप इस जनसांख्यिकीय बदलाव से प्रभावित होने वाले प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है। यूरोपीय संघ की आबादी आने वाले वर्षों में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद घटने की दिशा में जा सकती है।
अमेरिका में भी बदल रही जनसंख्या की तस्वीर
अमेरिका में फिलहाल आबादी में गिरावट की स्थिति तत्काल नहीं है, लेकिन यहां भी उम्रदराज लोगों की संख्या बढ़ रही है। अमेरिकी जनगणना अनुमानों के मुताबिक, अलग-अलग इमिग्रेशन परिस्थितियों के आधार पर अमेरिका की आबादी आने वाले दशकों में अपने पीक पर पहुंच सकती है।
मूडीज के मुताबिक, किसी देश की कुल आबादी घटने का इंतजार करना जरूरी नहीं है। जैसे-जैसे बुजुर्गों की हिस्सेदारी बढ़ती है, वैसे-वैसे सरकारों के सामने सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ने की चुनौती आने लगती है।
2050 तक बदल सकता है कामकाजी लोगों का अनुपात
G7 देशों में अभी 65 वर्ष से अधिक उम्र के प्रत्येक व्यक्ति के मुकाबले लगभग तीन कामकाजी लोग हैं। मूडीज के अनुमान के अनुसार, 2050 तक यह अनुपात घटकर करीब दो कामकाजी लोगों तक आ सकता है।
इस बदलाव का सीधा असर सरकारी वित्त पर पड़ सकता है। कामकाजी आबादी कम होने पर टैक्स से होने वाली आय पर दबाव आ सकता है, जबकि पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और बुजुर्गों की देखभाल पर सरकारी खर्च बढ़ सकता है।
आर्थिक विकास की रफ्तार भी हो सकती है प्रभावित
कामकाजी उम्र के लोगों की संख्या घटने का असर केवल सरकारी बजट तक सीमित नहीं रहेगा। श्रमबल कम होने से कई क्षेत्रों में कर्मचारियों की कमी हो सकती है। इससे कंपनियों की उत्पादन क्षमता और आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका है।
इसके अलावा, आबादी की उम्र बढ़ने के साथ उपभोक्ताओं की संख्या और उनकी खर्च करने की आदतों में भी बदलाव आ सकता है। ऐसे में अर्थव्यवस्थाओं को विकास की रफ्तार बनाए रखने के लिए उत्पादकता बढ़ाने और तकनीक के बेहतर इस्तेमाल पर जोर देना होगा।
AI और रोबोटिक्स बन सकते हैं मददगार
कामकाजी लोगों की कमी को दूर करने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। मशीनों और AI की मदद से कंपनियां कम कर्मचारियों के साथ ज्यादा उत्पादन करने में सक्षम हो सकती हैं।
फैक्ट्रियों से लेकर सर्विस सेक्टर तक ऑटोमेशन का इस्तेमाल बढ़ने से श्रम की कमी का कुछ असर कम किया जा सकता है। हालांकि, तकनीक हर समस्या का समाधान नहीं है। मशीनें उत्पादन बढ़ाने में मदद कर सकती हैं, लेकिन वे इंसानों की तरह उपभोक्ता के रूप में बाजार में मांग पैदा नहीं करतीं।
सिर्फ यूरोप और अमेरिका की समस्या नहीं
बढ़ती उम्रदराज आबादी का असर अब कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भी दिखाई दे रहा है। चीन, ब्राजील, थाईलैंड और तुर्किये जैसे देशों में भी जनसंख्या की औसत उम्र बढ़ रही है।
चीन इसका बड़ा उदाहरण है। पिछले कुछ दशकों में वहां 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। ऐसे देशों के सामने चुनौती और बड़ी हो सकती है, क्योंकि उन्हें विकसित देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम आय स्तर पर ही बढ़ती बुजुर्ग आबादी की जरूरतों को पूरा करना होगा।
सरकारों के सामने क्या होंगी चुनौतियां?
बुजुर्ग आबादी बढ़ने के साथ सरकारों को कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। पेंशन सिस्टम को मजबूत करना, स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता बढ़ाना, बुजुर्गों की देखभाल की व्यवस्था करना और पर्याप्त कामकाजी आबादी बनाए रखना इनमें प्रमुख हैं।
इसके साथ ही महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ाने, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर तैयार करने, उत्पादकता सुधारने और तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देने जैसी रणनीतियां भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
बदलती जनसंख्या का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर
दुनिया की जनसंख्या में बदलाव केवल आंकड़ों का मामला नहीं है। इसका सीधा संबंध रोजगार, सरकारी खर्च, टैक्स, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं, उपभोक्ता मांग और आर्थिक विकास से है।
अगर कामकाजी आबादी की तुलना में बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ती है, तो सरकारों और कंपनियों दोनों को अपनी आर्थिक रणनीतियों में बदलाव करना पड़ेगा। आने वाले दशकों में जनसंख्या की उम्र और श्रमबल की उपलब्धता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल रह सकती है।




