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सुप्रीम कोर्ट की बड़ी चेतावनी: कोर्ट रूम में इंसानी दिमाग का कोई विकल्प नहीं, फर्जी उदाहरणों पर ट्रिब्यूनल का फैसला रद्द

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलटी के एक फैसले पर गहरी चिंता जताई है। यह ट्रिब्यूनल व्यापार और कंपनियों से जुड़े विवादों की सुनवाई करने वाली एक विशेष सरकारी अदालत है। एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स के दिवालियापन से जुड़े एक मामले में इस ट्रिब्यूनल के फैसले को पूरी तरह खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी कानूनी फैसले में हर स्तर पर इंसानी दिमाग और नियंत्रण का होना बेहद जरूरी है। अदालत ने आधुनिक तकनीकों पर वकीलों और जजों की बढ़ती निर्भरता के खतरों को लेकर आगाह किया है।

क्यों नाराज हुई देश की सबसे बड़ी अदालत

सुप्रीम कोर्ट को जांच में पता चला कि ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले का आधार कुछ ऐसे पुराने मुकदमों और मिसालों को बनाया था, जो असलियत में कभी हुए ही नहीं थे। ये सभी उदाहरण कंप्यूटर और इंटरनेट सॉफ्टवेयर के जरिए खुद से गढ़े गए थे और पूरी तरह से नकली थे। इस पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने कहा कि कंप्यूटर प्रोग्राम द्वारा ऐसी गैर-मौजूद और मनगढ़ंत जानकारी तैयार करना और उसे कानून में मिसाल की तरह इस्तेमाल करना बेहद खतरनाक है। यह न्याय व्यवस्था के लिए किसी जहरीली गैस के रिसाव जैसा है जो अदृश्य रहकर पूरी बुनियाद को ही खत्म कर देता है।

फैसलों में इंसानी सूझबूझ सबसे जरूरी

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि कामकाज को तेज और आसान बनाने के लिए नई तकनीकों की मदद ली जा सकती है, लेकिन अंतिम फैसला सुनाने की जिम्मेदारी हमेशा इंसान के हाथ में ही रहनी चाहिए। अदालत ने माना कि आजकल काम के बढ़ते बोझ के कारण पेशेवर लोग कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। उन्होंने ब्रिटेन की एक कानून कंपनी का उदाहरण भी दिया जो पूरी तरह से नई तकनीकों पर आधारित है। लेकिन कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर इन तकनीकों पर बिना सोचे-समझे भरोसा किया गया, तो यह इंसानी सोच और तर्क करने की क्षमता को खत्म कर देगी।

मशीन के फैसलों पर जजों को रहना होगा सावधान

अदालत ने कहा कि जजों को बहुत ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। अगर बिना नियम-कानून के इन मशीनी प्रणालियों का इस्तेमाल किया गया, तो यह धीरे-धीरे हमारी पूरी न्याय प्रक्रिया को खराब कर देगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वह कंप्यूटर द्वारा गलत जानकारी देने की तकनीकी कमियों पर बात नहीं कर रहा है, क्योंकि वह काम इंजीनियरों और वैज्ञानिकों का है। कोर्ट का सरोकार सिर्फ इतना है कि न्याय की कुर्सी पर बैठकर कोई मशीन के भरोसे काम न करे। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले की गहराई से जांच के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक विशेष कमेटी बनाने का निर्देश दिया है।

क्या है यह पूरा विवाद

यह पूरा मामला एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स कंपनी के दिवालिया होने की प्रक्रिया से जुड़ा है। कंपनी की सस्पेंडेड डायरेक्टर यानी पद से हटाई गई निदेशक पूजा रमेश सिंह ने ट्रिब्यूनल के एक आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। जम्मू-कश्मीर बैंक ने कंपनी से अपने 87 करोड़ 43 लाख रुपए के बकाया कर्ज की वसूली के लिए ट्रिब्यूनल में अर्जी लगाई थी। ट्रिब्यूनल की मुंबई बेंच ने इस अर्जी को मंजूरी दे दी थी, जिसे बाद में बड़ी अदालत ने भी सही ठहराया था। लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो पता चला कि ट्रिब्यूनल ने इस फैसले को सही साबित करने के लिए कई काल्पनिक और नकली कानूनी उदाहरणों का सहारा लिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसलों को रद्द करते हुए ट्रिब्यूनल को दोबारा सिर्फ असली तथ्यों के आधार पर नया फैसला करने को कहा है।

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