अंग्रेजों के चमचों को पसंद नहीं आएंगे मदरसा, केशव मौर्य के बयान पर ओवैसी का पलटवार

हैदराबाद । ओवैसी ने ‘X’ पर एक पोस्ट में मदरसों की ऐतिहासिक और संवैधानिक वैधता का बचाव किया। उन्होंने मदरसों को भारत की आज़ादी की लड़ाई और विविध संस्कृति वाली विरासत से गहराई से जोड़ा।ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बुधवार को इस्लामिक संस्थानों के राजनीतिक आलोचकों पर निशाना साधा। उन्होंने खास तौर पर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं के उस बयानबाजी की आलोचना की जो मदरसों के खिलाफ की गई थी। आलोचकों पर कोई ठोस राजनीतिक आधार न होने का आरोप लगाते हुए, ओवैसी ने ‘X’ पर एक पोस्ट में मदरसों की ऐतिहासिक और संवैधानिक वैधता का बचाव किया। उन्होंने मदरसों को भारत की आज़ादी की लड़ाई और विविध संस्कृति वाली विरासत से गहराई से जोड़ा।
उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पर निशाना साधते हुए ओवैसी ने कहा केशव मौर्य सिर्फ़ मदरसों पर हमला कर सकते हैं क्योंकि उनकी कुर्सी असल में बस एक स्टूल है। जो लोग अंग्रेजों से प्यार करते हैं, उन्हें मदरसे कैसे पसंद आ सकते हैं? मदरसे अंग्रेजों के खिलाफ साजिशों और आज़ादी की लड़ाई के केंद्र थे। उन्होंने आज़ादी के लिए अनगिनत मुजाहिदीन तैयार किए, जबकि सावरकर अंग्रेजों को दया याचिकाएं लिख रहे थे। मदरसों के ऐतिहासिक महत्व पर ज़ोर देते हुए ओवैसी ने कहा कि भारत की कई जानी-मानी हस्तियों ने अपनी शुरुआती शिक्षा ऐसे ही संस्थानों में हासिल की थी।
उन्होंने कहा भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने मदरसे में पढ़ाई की थी। मुंशी प्रेमचंद और राजा राम मोहन राय ने भी मदरसों में ही शिक्षा पाई थी। संविधान का अनुच्छेद 30 हर अल्पसंख्यक समुदाय को अपने खुद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उन्हें चलाने का अधिकार देता है। ऐतिहासिक रूप से, कई प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्थानों और मदरसों के नेटवर्क (जैसे 1866 में स्थापित दारुल उलूम देवबंद) ने भारत की आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सक्रिय भूमिका निभाई थी। इन नेटवर्कों से जुड़े कई विद्वानों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का विरोध किया और खिलाफ़त आंदोलन और व्यापक आज़ादी की लड़ाई जैसे आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। भारत के पहले राष्ट्रपति ने अपनी आत्मकथा (‘एन ऑटोबायोग्राफ़ी’) में लिखा है कि बचपन में अपने गाँव में उन्हें एक स्थानीय मकतब में भेजा गया था, जहाँ उन्होंने एक “मौलवी साहब” की देखरेख में फ़ारसी सीखी थी।




