
बस्तर। छत्तीसगढ़ के विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा में सदियों पुरानी निशा जात्रा की परंपरा विधि-विधान के साथ निभाई गई। आधी रात के बाद अनुपमा चौक स्थित निशा गुड़ी में मंत्रोच्चार और पारंपरिक पूजा-अनुष्ठानों के बीच यह महत्वपूर्ण रस्म संपन्न हुई। राजपरिवार के सदस्यों, पुजारियों और ग्रामीणों की भागीदारी ने इस आयोजन की सांस्कृतिक महत्ता को एक बार फिर सामने रखा। बस्तर में निशा जात्रा को क्षेत्र की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और जनकल्याण की कामना से जोड़कर देखा जाता है।
आधी रात तक चले पूजा-अनुष्ठान
निशा जात्रा के अवसर पर शाम से ही निशा गुड़ी में भैरमदेव और खमेश्वरी देवी की पूजा शुरू हो गई थी। रात 12 बजे के बाद परंपरा के अनुसार अनुष्ठान के अगले चरण पूरे किए गए। ढोल-नगाड़ों की थाप और धार्मिक मंत्रोच्चार के बीच राजपरिवार के सदस्यों तथा पुजारियों ने रस्मों में भाग लिया।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में इस विधान को राज्य की रक्षा और अमंगल से बचाव की कामना के साथ संपन्न कराया जाता था। इसी वजह से निशा जात्रा को बस्तर दशहरा के विशिष्ट रात्रिकालीन अनुष्ठानों में गिना जाता है।
चार धार्मिक स्थलों पर निभाई गई बलि की परंपरा
निशा जात्रा के दौरान बस्तर की पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चार प्रमुख स्थलों पर बलि विधान किया गया। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, निशा गुड़ी में 11, मावली मंदिर में 2, सिंहद्वार में 2 और काली मंदिर में 1 बकरे की बलि दी गई। इस तरह कुल 16 बकरों की बलि के साथ संबंधित अनुष्ठान पूरे किए गए।
यह परंपरा बस्तर दशहरा की उन विशिष्ट रस्मों में शामिल है, जो इसे देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देती हैं।
12 से अधिक गांवों की भागीदारी से तैयार हुआ भोग
निशा जात्रा में आसपास के गांवों की सामूहिक भागीदारी भी देखने को मिली। राजूर, छिंदगुड़ा, एर्राकोट, मरलीगुड़ा, उडुवा, नेपपुर, रायकोट, आरापुर, चालकीगुड़ा, सिंघनपुर और चोकर समेत 12 से अधिक गांवों के ग्रामीण पारंपरिक भोग तैयार करने पहुंचे।
ग्रामीणों ने चावल और उड़द की दाल से भोग बनाया, जिसे देवी-देवताओं को अर्पित किया गया। इस अनुष्ठान के माध्यम से क्षेत्र की खुशहाली और अच्छी फसल की कामना की गई। पीढ़ियों से चली आ रही यह सामूहिक परंपरा गांवों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करती है।
रावण दहन नहीं, देवी-देवताओं की परंपराओं से जुड़ा है बस्तर दशहरा
देश के कई हिस्सों में दशहरा रावण दहन के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन बस्तर का दशहरा अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान रखता है। करीब 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व की परंपरा लगभग 600 वर्ष पुरानी मानी जाती है। इसका केंद्र मां दंतेश्वरी, स्थानीय देवी-देवताओं और जनजातीय रीति-रिवाजों से जुड़ी रस्में हैं।
श्रावण अमावस्या की पाट जात्रा से शुरू होने वाले इस महापर्व में काछनगादी, जोगी बिठाई, मावली परघाव, रथ परिक्रमा, निशा जात्रा और मुरिया दरबार जैसे कई महत्वपूर्ण आयोजन होते हैं।
आस्था और जनजातीय संस्कृति का प्रतीक है निशा जात्रा
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। निशा जात्रा में राजपरिवार, पुजारियों और ग्रामीणों की सहभागिता इस परंपरा को आज भी जीवंत बनाए हुए है। आधी रात में संपन्न होने वाला यह अनुष्ठान बस्तर की ऐतिहासिक मान्यताओं, सामुदायिक सहभागिता और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की विशिष्ट झलक प्रस्तुत करता है।



