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शेख हसीना से पहले इन नेताओं को भी मिली फांसी की सजा, एक को तो चौराहे पर मारी गई गोली

नई दिल्ली. बांग्लादेश की सत्ता से बेदखल पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को कल यानी 17 नवंबर 2025 को मौत की सजा सुनाई गई। यह फैसला देश के अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने दिया, जिसमें उन्हें 2024 के छात्र आंदोलन पर क्रूर दमन के लिए मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी ठहराया गया। हसीना फिलहाल भारत में निर्वासन में हैं, इसलिए यह सजा उनकी गैर-हाजिरी में सुनाई गई। यह घटना न सिर्फ बांग्लादेश की राजनीति में भूचाल ला रही है, बल्कि दुनिया भर में नेताओं के भाग्य की याद दिला रही है। इतिहास में कई ऐसे नेता हुए हैं, जिन्हें सत्ता के नशे, भ्रष्टाचार या अत्याचारों के लिए मौत की सजा मिली। आज हम समझेंगे कि हसीना के साथ क्या हुआ और दुनिया के अन्य नेताओं के साथ क्या समानताएं हैं।

शेख हसीना का सफर: सत्ता से निर्वासन तक

शेख हसीना बांग्लादेश की राजनीति की एक बड़ी शख्सियत हैं। वे बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं, जिन्होंने 1971 में पाकिस्तान से आजादी की लड़ाई लड़ी। हसीना ने 2009 से 2024 तक प्रधानमंत्री के रूप में देश को आर्थिक विकास की राह पर डाला। गारमेंट उद्योग को बढ़ावा देकर बांग्लादेश को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक बनाया। लेकिन उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार, लोकतंत्र की हत्या और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे।

2024 में सब बदल गया। जुलाई में छात्रों ने सरकारी नौकरियों में कोटा सिस्टम के खिलाफ विरोध शुरू किया। यह आंदोलन जल्द ही पूरे देश में फैल गया, जहां लोग हसीना सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। सरकार ने इसका जवाब गोली चलाकर दिया। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, इस दमन में 1,400 से ज्यादा लोग मारे गए, ज्यादातर युवा छात्र। आखिरकार, 5 अगस्त 2024 को हसीना को इस्तीफा देना पड़ा और वे हेलीकॉप्टर से भारत भाग आईं।

अब, 17 नवंबर को ढाका की अदालत ने उन्हें तीन मामलों में दोषी ठहराया: उकसावा देना, हत्याओं का आदेश देना और अपराधियों पर कार्रवाई न करना। दो मामलों में फांसी और एक में उम्रकैद की सजा सुनाई गई। पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को भी फांसी हुई, जबकि पूर्व पुलिस प्रमुख को 5 साल की सजा मिली। हसीना ने फैसले को “राजनीतिक साजिश” बताया और कहा कि यह “कठपुतली अदालत” का काम है।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, जो नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में चल रही है, उसने इसे ऐतिहासिक फैसला कहा। लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने मौत की सजा का विरोध किया, कहा कि यह सभी परिस्थितियों में गलत है। भारत ने भी फैसले पर नोटिस लिया लेकिन हसीना के प्रत्यर्पण पर चुप्पी साधी। अब सवाल यह है कि क्या यह सजा अमल में आएगी? बांग्लादेश कानून के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में अपील हो सकती है, लेकिन हसीना के बेटे ने कहा कि वे तभी अपील करेंगे जब लोकतांत्रिक सरकार बने।

मौत की सजा: एक दुर्लभ लेकिन कठोर सजा

दुनिया में मौत की सजा अब कम हो रही है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, 2024 में सिर्फ 15 देशों में 1,518 फांसियां हुईं, जो 2015 के बाद सबसे ज्यादा थीं, लेकिन कुल देशों में से 70% ने इसे खत्म कर दिया है। फिर भी, नेताओं के लिए यह सजा राजनीतिक बदले की तरह लगती है। हसीना का मामला भी ऐसा ही है – यह सत्ता की लड़ाई का हिस्सा लगता है। आइए जानते हैं- दुनिया के वो नेता कौन-कौन से हैं जिन्हें ऐसी ही सजा मिली। हमने कुछ प्रमुख उदाहरण चुने हैं, जो इतिहास के अलग-अलग दौरों से हैं।

1. सद्दाम हुसैन (इराक): तानाशाह का अंत

सद्दाम हुसैन इराक के राष्ट्रपति थे, जो 1979 से 2003 तक सत्ता में रहे। वे क्रूर शासक के रूप में मशहूर थे- कुर्द विद्रोहियों पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया, जिसमें हजारों मारे गए। 2003 में अमेरिका के हमले के बाद वे पकड़े गए। 2006 में इराकी अदालत ने उन्हें 1982 के दजैल नरसंहार के लिए मौत की सजा सुनाई। 30 दिसंबर 2006 को उन्हें फांसी दे दी गई। वीडियो लीक होने से दुनिया भर में हंगामा मच गया। सद्दाम का मामला दिखाता है कि कैसे युद्ध और अत्याचार सत्ता का अंत कर सकते हैं। हसीना के मामले से समानता? दोनों पर प्रदर्शकारियों पर गोली चलाने का आरोप।

2. मुअम्मर गद्दाफी (लीबिया): विद्रोह की आग में जल गए

लीबिया के तानाशाह गद्दाफी 1969 से 2011 तक सत्ता में रहे। उन्होंने तेल की कमाई से देश को अमीर बनाया, लेकिन विरोधियों को कुचलते रहे। 2011 के अरब स्प्रिंग में नागरिकों ने विद्रोह किया। नाटो के हवाई हमलों की मदद से विद्रोही सत्ता गिरा चुके थे। गद्दाफी को उनके गृहनगर सिरते में पकड़ा गया। बिना मुकदमे के ही विद्रोहियों ने उन्हें पीट-पीटकर मार डाला। मौत की सजा औपचारिक नहीं थी, लेकिन प्रभावी रूप से वही हुई। यह हसीना को याद दिलाता है – दोनों की सत्ता छात्रों और युवाओं के विद्रोह से गिरी।

3. निकोलस चाउशेस्कु (रोमानिया): कम्युनिस्ट साम्राज्य का पतन

रोमानिया के कम्युनिस्ट चाउशेस्कु 1965 से 1989 तक शासक रहे। उन्होंने देश को गरीबी में डुबो दिया, लेकिन खुद महल जैसे घर बनवाए। 1989 में पूर्वी यूरोप में क्रांति की लहर चली। सेना ने विद्रोहियों का साथ दिया। चाउशेस्कु और उनकी पत्नी एलेना को पकड़ लिया गया। एक त्वरित मुकदमे में उन्हें भ्रष्टाचार और जनता के खिलाफ अपराधों के लिए फांसी की सजा सुनाई गई। 25 दिसंबर 1989 को क्रिसमस के दिन उन्हें गोली मार दी गई। यह दुनिया का पहला टीवी पर दिखाया गया फांसी ट्रायल था। हसीना की तरह, चाउशेस्कु भी आंदोलन के शिकार हुए।

4. चार्ल्स टेलर (लायबेरिया): अफ्रीका का खूनी डायमंड किंग

लायबेरिया के राष्ट्रपति टेलर 1997 से 2003 तक सत्ता में रहे। उन्होंने गृहयुद्ध छेड़ा, जिसमें लाखों मारे गए। ब्लड डायमंड्स बेचकर हथियार खरीदे। 2003 में विद्रोहियों ने सत्ता हथिया ली। टेलर भागे, लेकिन स्कॉटलैंड में विशेष अदालत ने उन्हें युद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराया। 2012 में 50 साल की सजा सुनाई गई, जो मौत की सजा से कम लेकिन आजीवन कैद के बराबर। वे अभी भी जेल में हैं। यह मामला दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय अदालतें कैसे नेताओं को सजा देती हैं – हसीना के ट्रिब्यूनल की तरह।

5. परवेज मुशर्रफ (पाकिस्तान): पड़ोसी का उदाहरण

पाकिस्तान के पूर्व सैन्य तानाशाह परवेज मुशर्रफ ने 1999 में तख्तापलट कर सत्ता हथियाई। 2007 में इमरजेंसी लगाकर संविधान को कुचला। 2019 में उन्हें राजद्रोह के लिए फांसी की सजा सुनाई गई। लेकिन वे दुबई में निर्वासन में थे, इसलिए सजा अमल में नहीं आई। 2023 में उनकी मौत हो गई। हसीना का मामला बिल्कुल वैसा ही- दोनों पड़ोसी देशों से, दोनों गैर-हाजिर में सजा, और दोनों पर लोकतंत्र दमन का आरोप।

6. विदकुन क्विस्लिंग (नॉर्वे): विश्व युद्ध का गद्दार

दूसरे विश्व युद्ध में नाजी जर्मनी के साथ मिलकर नॉर्वे पर कब्जा करवाने वाले क्विस्लिंग को 1945 में राजद्रोह के लिए फांसी दी गई। उनका नाम आज क्विस्लिंग शब्द बन गया है, जो गद्दार का पर्याय है। यह पुराना लेकिन महत्वपूर्ण उदाहरण है कि कैसे सहयोगी शक्तियों के साथ मिलना सजा का कारण बनता है।

7. जुल्फिकार अली भुट्टो (पाकिस्तान, 1979)

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री को जनरल जिया-उल-हक के सैन्य शासन के दौरान हत्या की साजिश रचने के आरोप में रावलपिंडी में फांसी दे दी गई थी।

क्या सजा न्याय है या बदला?

ये उदाहरण बताते हैं कि मौत की सजा अक्सर राजनीतिक उथल-पुथल के बाद आती है। कुछ मामलों में यह न्याय लगता है (जैसे सद्दाम के अत्याचार), तो कुछ में बदला (जैसे गद्दाफी की हत्या)। हसीना के मामले में भी बहस छिड़ी है। ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि ट्रिब्यूनल में निष्पक्षता की कमी थी। बांग्लादेश में फरवरी 2026 के चुनाव आने वाले हैं। हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध है, जो हिंसा भड़का सकता है। दुनिया देख रही है कि क्या यह सजा लोकतंत्र को मजबूत करेगी या और अस्थिरता लाएगी।

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